अभागे का आवरण, अरबी-हिंदी संस्करण

विक्टर ह्यूगो

अभागे

लेआउट

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अरबी में शीर्षक
البؤساء
मूल प्रकाशन
1862
भाषाएँ
अरबी और हिंदी
पृष्ठ
लगभग 409
संस्करण
संक्षिप्त

पुस्तक का सारांश

रोटी चुराने के अपराध में उन्नीस वर्ष की सज़ा काटकर छूटा ज्याँ वालज्याँ न काम पाता है न आश्रय, उस रात तक जब एक बिशप उसे अपने यहाँ ठहराता है। झूठे नाम से दूसरा आदमी बनकर वह कोज़ेत को अपने पास ले आता है, जो ग़रीबी में मरी एक मज़दूरनी की बेटी है, और छिपते हुए उसे पालता है। इंस्पेक्टर जावेर, जो मान ही नहीं सकता कि कोई क़ैदी बदल सकता है, उसका पीछा पूरे फ़्रांस में और 1832 की बैरिकेडों तक करता है। उपन्यास दरिद्रता, क़ानून, प्रायश्चित और उन लोगों के साथ समाज के बरताव की पड़ताल करता है जिन्हें उसने ख़ुद दोषी ठहराया। ह्यूगो कुछ ज़िंदगियों की नियति को एक पूरी सदी के चित्र और अपनी ही पैरवी से जोड़ देते हैं।

एक अंश पढ़ें: दोहरा स्तंभ

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